दलित विमर्श : प्रासंगिकता कल आज और कल

  • रानी आभा, Dr. Head Dept. of Hindi S.S.M.C. Ranchi University Ranchi समकालीन हिन्दी साहित्यकार, India
Keywords: Dalit Literature, Deprived, India, Indian Civilization, Hinduism

Abstract

Research paper on Dalit Literature.

जब हम दलित शब्द का इस्तेमाल करते हैं तो सहज ही हमारे सम्मुख एक ऐसे दीन हीन, लाचार, शोषित, कृषकाय वर्ग की छवि उभरती है जो हमारे समाज में सबसे निचली सीढ़ी पर खड़ा हुआ संघर्षरत वर्ग है। समाज में किसी संभ्रांत व्यकित को यदि हम मजाक में भी दलित कह देंगे तो उसे वह बात गोली की तरह लगेगी। सामान्य तौर पर हम दलित का अर्थ शूद्र वर्ण वाले व्यकित समाज के तौर पर लेते हैं।

References

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दलित विमर्श : प्रासंगिकता कल आज और कल
Published
2013-12-18
How to Cite
आभार. (2013). दलित विमर्श : प्रासंगिकता कल आज और कल. SOCRATES, 1(1), 24-29. Retrieved from https://www.socratesjournal.com/index.php/SOCRATES/article/view/68
Section
Research Papers